हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

Viratpat Darshan

द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याविद्ये निहिते यत्र गूढे ।
क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः ॥१॥

dve aksare brahmapare tvanante
vidyavidye nihite yatra gudhe ।
ksaram tvavidya hyamrtam tu vidya
vidyavidye isate yastu so'nyah ॥ 1॥

chapter 5 Verse1 Swetasvatara Upanishad

महमति प्राणनाथ
हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर।।१६५

प्रकरण ३१ prakash hindi
इस नश्वर संसारके पार अविनाशी बेहद भूमिका है, जिसके पार अक्षरब्रह्म है. अक्षरधामके भी पार परमधाम है, आप इस परमधाममें जागृत हो जाइए.
Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.
la (kshar) Nothing
illa (Akshar) exists
illilah (Akshararateet) beyond illa is Allah the Supreme God.
The world, the seven heavens and seven lower plains are nothing (perishable world created for a play).
The Akshar the truth embody of the Supreme Brahm creates such worlds and destroys them in a moment. He is ever living and He exists. Beyond Akshar is the Aksharateet abode of Supreme Brahm-God-Allah. Wake up soul in this abode!

महतः परमव्यक्तमव्यत्कात पुरुषः परः
पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥

कठोपनिषद /१/३/११
महतः = उस जीवात्मा से (आदि नारायण से)
परम = बलवती है
अव्यक्तम = अक्षर ब्रह्म से भी
परः = परमपुरुष परब्रह्म परमात्मा
पुरुषात = परम्पुरुष परब्रह्म से
परम श्रेष्ठ और महिमामण्डित

किंचित न = कुछ भी नहीं है
सा काष्ठा = वही सब की परम अवधि (और)
सा परा गतिः = वही सब की परम गति है

सम्पूर्ण चौरासी लाख योनी के प्रमुख श्रोत जीवात्मा (आदि नारायण) से बलवान अक्षर ब्रह्म है क्योंकि इन के द्वारा नारायण की उत्पति हुइ है। अव्यक्त कूतस्थ अक्षर ब्रह्म से परे परमपुरुष परब्रह्म परमात्मा अक्षरातीत हैं । उन से परे कुछ भी नहिं है, वही सब की परम अवधि और परमगति भी है ॥

यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम् ।
नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥६॥

yattadadreshyam agrahyam agotram avarnam
achakshuh shrotram tadapanipadam ।
nityam vibhum sarvagatam susukshmam
tat avyayam yadbhutayonim paripashyanti dhirah ॥6॥
first Mundak first part
One who cannot be perceived, one whom the senses/organs cannot grasp, who cannot be kind/type/classified in the gotra or classifications, one cannot be seen, heard or felt by touch but who is eternally existing, who is truth, all pervading, very subtle, imperishable, residing in the heart of living and source of all the living in the living beings.

दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः ।
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः परः ॥२॥

divyo hyamurtah purushah sa bahyabhyantaro hyajah ।

aprano hyamanah shubhro hyaksharat paratah parah ॥ 2॥
Mundak upanishad dwitiya pratham khanda
second Mundak first part

The Lord (Purush) is very divine, who exist within and without. He is free from prana and the mind, He is beyond akshar.
He resides in the heart of living as supreme consciousness!
यदक्षरं परंब्रह्म तत्सूत्रमिति धार्येत् ।
सूचनात्सूत्रमित्याहु: सूत्रं नाम परं पदं ॥
तत्सूत्रं विदितं येन स विप्रो वेदपारग:
(ब्रह्मोपनिषद)

अर्थ: सच्चिदानंद ब्रह्म के सत अंग अक्षर ब्रह्म से परे परब्रह्म उत्तम पुरुश ही समस्त सृष्टि के सूत्रधारी हैं । इस मूल सूत्र से परिचित ही यथार्थ में वेदज्ञ ब्रह्मज्ञानी हैं । परमहंस उसी अविनाशी सूत्र को धारण करते हैं ।

क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः ।
तस्याभिध्यानाद्योजनात्तत्त्व भावात् भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः ॥१०॥

ksaram pradhanamamrtaksaram harah
ksaratmanavisate deva ekah ।
tasyabhidhyanadyo janat tattva
bhavat bhuyascante visvamayanivrttih ॥ 10॥

Swetasvatara Upanishad

(भगवत गीता अध्याय १५ - स्लोक १६ तीन पुरुष का वर्णन )
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च क्षर: सर्वाणि भूतानि कुटस्थो अक्षर उच्यते। उत्तम: पुरुषस्त्त्वन्य: परमात्मेत्युदाह्रत:।
लोके = इस संसार में
क्षर: = नाशवान (आदि नारायण पर्यन्त के लोक)
च = और
अक्षर = अविनाशी
एव = ही
इमौ = ये
द्वौ = दो प्रकार के
पुरुषौ = पुरुष हैं
सर्वाणि = सम्पूर्ण
भूतानि = भूतप्राणियों एवं प्रकृत लोक
कुटस्थो = अक्षर पुरुष अविनाशी
उच्यते = कहा जाता है
उत्तम: = उत्तम/श्रेष्ठ
पुरुष: = परमपुरुष पर ब्रह्म
तु अन्य = तो अन्य ही है (उन्हीं को)
परमात्मा = प्रब्रह्म परमात्मा
इति = इस प्रकार
उदाहृत: कहा गया है।
भावार्थ :=
इस बिराट ब्रह्माण्ड मे क्षर नाशवान और अविनाशी अनादि अक्षर दो पुरुष हैं । सम्पूर्ण भूतप्राणियों सहित नारायण पर्यन्त के लोकालोक सभी नाशवान हैं, और अक्षर पुरुष जो नारायण के रचयिता है, वे अविनाशी है । इस से आगे एक अन्य परमपुरुष अक्षरातीत है, उन्हीं को ही "परमात्मा" कहा जाता है।

हम ब्रह्मसृष्ठ आई धाम से,अक्षर खेल देखन ।
खेल देख के जागिए, घर असलू अपने तन ॥

हम सभी ब्रह्मात्माएँ खेल देखने के लिए परमधाम से इस जगतमें आई हैं, अब इस खेलको देखकर जागृत हो जाइए, अपने मूल स्वरूप परमात्मा तो परमधाम में ही है॥

We the celestial souls have come to see this world which is full of misery, ignorance,amnesia of self knowledge. Haven't we seen enough! Time has come to realise that we are the part of satchidanand (Truth, eternal conciousness and bliss) and our abode is paramdham.
The soul from Paramdham (arash) have to come to see the dream world created by Akshar. The creation and destruction of cosmos(universes) is Akshar's play. He creates these universes mentally and he does out of his nature and free will. Creation is nothing but a play a pastime of Akshar Brahm. The soul residing in Aksharateet dham with Supreme Brahm are called Brahmatma who desired to see this play, once their desire is fulfilled they will awaken in their own self of the abode.

युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्विश्लोक एतु पथ्येव सूरेः ।
शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः ॥५॥

yuje vam brahma purvyam namobhirvisloka
etu pathyeva sureh ।
srnvantu visve amrtasya putra a ye
dhamani divyani tasthuh ॥ 5॥

These soul has primordial relationship with Brahm, they will purify the world. They reside in the divine abode.


इन ठौर ए मिलावा, जिन जुदा जाने आप ।
इतहीं तेरी कयामत, याही ठौर मिलाप।।२१

जब ब्रह्मात्माएँ स्वयंको एक दूसरेसे भिन्न नहीं समझेंगी उस समय उसी स्थानको मूल मिलावा समझना चाहिए. इसलिए हे आत्मा ! यहीं पर तेरी जागृति होगी और तू मूलमिलावाकी बैठकका अनुभव कर सकेगी.

In this very place you can unite and experience the mool milava(original meeting place) when all the separation you know ceases. When the self gets awakened and gain the unity consciousness then think you have reached the mool milava (original meeting place). This which is your kayamat(awakening of the soul from this body) and you will experience the union just over here.

prakaran 33 Shri parikrama

पार ना कहूं अरस का, सो कह्या बीच दिल मोमिन ।
ए बिचार कर देखिए बका, सो ल्याए बीच दिल इन ।।४

परमधामका कोई पारावार ही नहीं है किन्तु उसे ब्रह्मात्माओंके हृदयके अन्दर कहा गया है. जरा विचारपूर्वक देखो, ब्रह्मात्माओंके हृदयके अन्दर ही अखण्ड परमधामको अङ्कित कर दिया है.
The is no limit to Paramdham but which is within the heart of the celestial souls(Brahm atma, momin, chosen souls). Ponder over this about eternal abode which is brought by these souls in whose heart is called the Paramdham.
prakaran 34 Shri parikrama


होत नूर थें दूजा बोलते, दूजा नूर बिना कछू नाहिं ।
एक वाहेदत नूर है, सब हक नूर के माहिं ।।३०

परमधाममें प्रकाशके अतिरिक्त यदि कुछ होता तो उसके विषयमें कुछ कहा जा सकता. किन्तु वहाँ इसके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं, मात्र प्रकाशका ही अद्वैत स्वरूप है. इस प्रकार परमधामकी यावत् सामग्री श्रीराजजीके प्रकाशसे ओत-प्रोत हैं.

In Paramdham there is nothing other than Supreme(Brahm)'s light. The unity consciousness is the light and everything including the Supreme is one with it.
All that exists in Nijdham/ Brahmdham/ Paramdham /Arash azeem is consciousness of Aksharateet Shri Krishna and nothing else. Only unity consciousness is the light and all including the Supreme Brahm Shri Krishna is in it. All in One and One in all!


नूर कहे महामत रूहें, देखो नजरों नूर इलम ।
वाहेदत आप नूर होए के, पकडो नूर जमाल कदम ।।३१

महामति कहते हैं, हे ब्रह्मात्माओ ! धामधनीके प्रकाशस्वरूप इस तारतम ज्ञाानको देखो एवं स्वयं भी तेजोमय अद्वैत स्वरूपमें जागृत होकर धामधनीके चरण कमलोंको हृदयमें धारण करो.
Mahamati (Higher/Greater Intelligence) say O souls, See the sight by the divine light of wisdom (tartamgyaan) and awakening in the unity consciousness (oneness)- adwait-vahedat thus becoming the light yourself, hold tightly the feet of Aksharateet Lord (Noor Jamal).
प्रकरण ३५ Shri parikrama


जिमी चेतन बन चेतन, पसु पंखी सुध बुध।
थिर चर सबे चेतन, याकी सोभा है कै विध ।।३०

परमधामकी दिव्य भूमि तथा वन आदि सभी चेतनमय हैं. यहाँके पशुपक्षीकी सुधि तथा बुद्धि भी विलक्षण है. यहाँके चल-अचल सभी चैतन्य हैं. इनकी विविध शोभाका वर्णन नहीं हो सकता है.

The ground is full of consciousness so is the forest and the birds and animals have complete consciousness and the intelligence both. All the inanimate objects are also full of consciousness, there are various types of splendour.

तो कह्या थावर चेतन, अपनी अपनी मिसल।
ए अंतर आंखें खुले पाइए, पर आतम सुख नेहेचल ।।३१

परमधामके सभी स्थावर पदार्थ भी चैतन्य कहलाते हैं. अपने-अपने समूहमें ये सभी चेतन हैं. किन्तु अन्तर्दृष्टि खुलने पर ही पर -आत्माके अखण्ड आनन्दका अनुभव किया जा सकता है.

In Paramdham animate and inanimate all that exist is conscious (can feel) of their own kind. If one can see when one's inward eye (eye of the soul ) is opened and then one can understand the what eternal bliss the original soul in Paramdham experience.

प्रकरण ३८ shri parikrama
Mahamati Prannath
Sundarsathji,
You are related to real moolmilava from where you have come. Day and night contemplate over here, Master has allowed you to play this sport from here (you are sitting in Paramdham yet experience this world of misery).

ए तुम ताले तो आइया, जो तुम असल खिलवत।
निसदिन सहूर एही चाहिए, हक बैठे तुमें खेलावत।।३३/1 sagar

तुम्हारे लिए इस ब्रह्मज्ञाानका अवतरण इसी कारण हुआ है कि तुम्हारा सम्बन्ध अद्वैत परमधामके मूलमिलावेसे है. इसलिए अर्हिनश इसका चिन्तन करते रहो. यहीं पर बैठाकर धामधनी तुम्हें यह खेल दिखा रहे हैं.
The revelations of Supreme is because of the celestial souls who are residing in the real original meeting place (where we are watching the play), day and night contemplate in this as the Supreme Commander our Lord is sitting here and showing you this game.
prakaran 1 sagar granth

चीज सबे अरस चेतन, बस्तर या भूषन।
सुख लेत हकके अंग का, यों करत अति रोसन।।६ 9 sagar

वस्त्र तथा आभूषण सहित परमधामकी सभी वस्तुएँ चैतन्यमय हैं. वे भी श्रीराजजी एवं श्रीश्यामाजीके अङ्गोंका स्पर्श प्राप्त कर आनन्दका अनुभव करतीं हैं. इसके कारण उनकी आभा और भी प्रदीप्त होती है.
All the things in the Arash(Paramdham ultimate abode of the soul) are conscious even the clothes and jewels and they experience the bliss of being with the Supreme Brahm and thus they are extremely enlightened!

नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्चं न मध्ये न परिजग्रभत् ।
न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद् यशः ॥१९॥

nainamurdhvam na tiryancham
na madhye na parijagrabhat ।
na tasya pratima asti
yasya nama mahad yasah ॥ 19॥

Swetasvatara Upanishad chapter 4 verse 19
નીચેથી ઊપરથી તે ના આસપાસથી પકડાયે,
મધ્યભાગથી પણ તે પ્રભુ ના કોઈરીતે જકડાયે;
‘મહાન યશ’ છે નામ તેમનું, યશ છે તેનો સર્વસ્થળે,
તે પ્રભુની ના ઉપમા કોઈ, જેથી તેનો મેળ મળે. ॥૧૯॥

The heart of the Brahmatma (Momin) is Paramdham!

ब्रह्म मुनि सुन्दरसाथ
अभाविनो भविष्यन्ति मुनयो ये ब्रह्मरूपिण:
उत्पन्ना: ये कलौयुगे प्रधान पुयषाश्रया:।
कथायोगेन तान्सर्वान्पुजयिश्यन्ति मानवा:
यस्य पुजा प्रभावेण जीव सृष्टि: समुद्धर:।।
हरिवंश पुराण भविष्य पर्व अ.४

अर्थात कलियुग में कभी भी न प्रगट होने वाले वे ब्रह्मस्वरूप मुनि प्रगट होंगे, जो प्रधान पुरुष अक्षरातीत के आश्रय में ही रहेंगे ।
उनके द्वारा ब्रह्मज्ञान रूपी कथायोग का श्रवण करके सभी मनुष्य उनकी पूजा करेंगे। उस पूजा के प्रभाव से संपूर्ण जीवसृष्टि का उद्धार होगा।
In kaliyug, those who has never appeared before, those Supreme soul (whose forms are alike Brahm the Supreme) will appear though they continue to shelter in the Supreme beloved Lord.
The human after listening to their discourse will worship them and by the influence of this worship, entire living being will be salvaged.
जो कोई निज धाम की, सो निकसो रोग पेहेचान।
जो सुरत पीछी खैंचहीं, सो जानो दुसमन छल सैतान।।

जो परमधामकी आत्माएँ हैं, वे राग-द्वेषरूपी रोगको पहचानकर उससे मुक्त हो जाएँ. परमधामकी ओर जा रही सुरताको जो मायाकी ओर खींचते हैं, उन्हें ही छल-कपट वाले शत्रु समझना.


अरस कहिये दिल तिन का, जित है हक सहूर|
इलम इसक दोऊ हक के, दोऊ हक रोसनी नूर|| महासिंगार/२४/४२

Aras kahiae dil tin kaa, jit hai haq sahoor; Ilam isak dou haq ke, dou haq rosanee noor. Mahasingaar/24/42

उन्ही आत्माओं का दिल वस्तुतः परमधाम कहा गया है, जहाँ पर हर पल श्री राज जी का चिन्तन, उन्ही की चितवनी चलती रहेती है| वस्तुतः ज्ञान और प्रेम, दोनों ही श्री राजजी के तेजोमय प्रकाश स्वरुप की अमूल्य निधियाँ हैं|

Only that heart is said to be the Abode of the Lord Almighty, Paramdham, which contemplates on beloved Lord ceaselessly. Literally, Knowledge and Love of the Supreme Commander, both are His essence of His illuminous Form.

बृहच्च तद् दिव्यमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच्च तत् सूक्ष्मतरं विभाति ।
दूरात् सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यन्त्विहैव निहितं गुहायाम् ॥७॥

brihaccha tad divyam achintya rupam
sukshmaccha tat sukshmataram vibhati ।
durat sudure tadihantike cha
pashyantvihaiva nihitam guhayam ॥7॥

Mundak Upanishad 3/1part

तलाश

Image: 

मनमानी करते तलाशते आज़ादी और ख़ुशी,
मिलता दुःख दर्द, जंजीरें और रस्सी ,
अरमानों की लम्बी कतार होती,
मन की मुराद कभी पूरी नहीं होती ,
मेहनत में कोई कसर नहीं छोड़ी,
पर ख़ास आता जेब में एक दो कौड़ी,
चाहती हर समस्या आसानी से हो हल,
पर भी हाथ लगती कठिनाई और दलदल,
आम मांगने पर मिलता बबूल,
हर दुआ न होती कबूल,
स्ट्रेस ने अंगीकार किया,
उच्च रक्तचाप ने दबोच लिया,
जीवन हरियाली सुख गयी,
बुद्धि की गति रुक गयी ,
मैं ने मुझ को दिया बहुत टेंशन,
तब याद आयी तेरी और तुझ पर हुआ अटेंशन,

दुर्लभ होते हैं सतगुरु

Image: 

सुन्दरसाथजी आप सबके चरण कमल में प्रेम प्रणाम।
वाणी का कथन सर्वोपरि है यह वाणी सत्य है तब इसको माने नहीं तो मन मानी करें आप का जीवन आपका विश्वास।

निजसुख

Image: 

यह सृस्टि के सभी लोक (१४ लोक ) उनके स्वामी आदि नारायण की उत्पत्ति से आगे सात सुन्य निराकार निरंजन सारे क्षर ब्रह्माण्ड यानि हद भूमि जिनका कालांतर में क्षय होता हैं उसके पार बेहद (सत स्वरुप अक्षर ब्रह्म के अंतःकरण) यह अक्षय हैं और इनके पार के चेतन चित्त अनुपम स्वरुप हैं यह पूर्ण ब्रह्म हैं, वे सभी चेतना के श्रोत हैं और घट घट में विराजे हैं यह प्रेम रूप हैं इसीलिए ह्रदय में प्रेम उत्पन्न होने से प्राप्त होते हैं और आनंद स्वरुप श्यामा और अंगना सभी इनके साथ ही होते हैं और जब ऐसा होता है तब अपना ह्रदय ही परम धाम हो जाता है। देखिये यह अंतर की बात है बाह्य दृष्टि से यह समझ नहीं आयेगा।

तारतम ज्ञान की साक्षी श्री कृष्ण श्याम ने आड़ीका लीला द्वारा

Image: 

जागनी ब्रह्माण्ड में श्यामा वर श्याम सुन्दर जो परमधाम के धनि हैं प्रगट हुए उन्होंने अपना निज का नाम श्री कृष्ण और वह पूर्ण ब्रह्म हैं कहा और अक्षरातीत परमधाम अनादि है कहा और ब्रह्म सृष्टि और ब्रह्म वतन प्रगट किया जाहेर किया। और ब्रज रास में श्री कृष्ण की जो लीला हुई वह अक्षरातीत पूर्ण ब्रह्म श्री कृष्ण ने अपने ही ब्रह्म आत्माओं के संग खेला है यह भी जाहेर किया वह लीला अक्षर ने देखा और उनकी अक्षरातीत श्री कृष्ण पूर्ण ब्रह्म परमात्मा की लीला देखने की मनोरथ पूर्ण हुयी।

अब ब्रह्म और ब्रह्मसृष्टि और ब्रह्म वतन सब विध जाहेर भये

Image: 

महामति कहे हो मेहराज कहे हो इंद्रावती कहे हो या कहे प्राणनाथ एक ही अक्षरातीत परमधाम के धनि श्री कृष्ण श्याम को ही जाहेर कर रहें है।धाम धनि श्यामा के वर श्याम परम सत्य हैं उन्होंने स्वयं का नाम श्री कृष्णजी और परमधाम अनादि अक्षरातीत जो निराकार के पार अक्षर उनके भी पार है खुद प्रगट होकर जाहेर किया।

Following Vs Labeling

When we follow Radha means we walk in the path where we become like her and unite with Shri Krishna or find Shri krishna in the heart of the soul. The prem the love is Radha's path. When we follow Mohamad means we walk in path where we become like him and meet Allah or make the heart the abode of Allah. Ishk the love is the path of Mohamad.
When we follow Jesus means we walk in the path where we become like him and unite with Father, the Lord and find the kingdom of heaven within. Love is the path of Jesus.

तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा

Lets not just do analysis and appreciate it as nice poem!
Lets pledge today that we will live by its words.
Love to all.

तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा
تو ہندو بنےگا نہ مسلمان بنےگا
... ... You’ll become neither Hindu nor Muslim
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
انسان کی اولاد ہے انسان بنےگا
You are the child of a human; you’ll become a human
(as opposed to being labeled as Hindu or Muslim)

अच्छा है अभी तक तेरा कुछ नाम नहीं है
اچھا ہے ابھی تک تیرا کچھ نام نہیں ہے
Good that ’til now you have no name

श्री कृष्ण के क्षर, अक्षर और अक्षरातीत स्वरुप

श्री कृष्ण के क्षर, अक्षर और अक्षरातीत स्वरुप
श्री कृष्ण अक्षरातीत परमधाम में आनंद स्वरुप श्यामा और १२,००० ब्रह्मात्माओं के साथ प्रेम लीला करतें हैं। श्री कृष्ण परब्रह्म हैं और श्यामा और सखियाँ और पचीस पक्ष परमधाम और सत स्वरुप अक्षर भगवान सभी इन्ही के अंश हैं। ब्रह्मधाम की यह लीला को स्वलीला द्वैत कहते हैं। सभी एक ब्रह्म के अंश हैं और ब्रह्म सिर्फ एक ही है सिर्फ लीला में भिन्न दिखाई देते हैं।

jaagate raho

The movie begins with cops calling 'jaagate raho' keep awake, where as they themselves are sleeping and calling for the sake of calling. A stranger from native place comes to this place at night. He is thirsty and is looking for water. A rich but totally drunk appears singing the song that life is just a dream and in this what is truth or what is false. We follow what our heart without reflecting whether it is wrong or right. When one drop of drink fell on the lips of rock, its heart started to beat and said the life is nothing but dream.

महामति प्राणनाथ वाणी के कुछ सार

परम ज्ञानी सतगुरु सदा सर्वदा नित्य अखंड निज नेहेचल अविचल प्रियतम अनादी अक्षरातीत किशोरंगम धामधनी श्री कृष्ण श्याम सुन्दर सच्चिदानंद पारब्रह्म पूर्ण परमात्मा पुरोषत्तम प्रेम पुंज कृपा सिन्धु दया सागर सत्य हैं और ब्रह्मानंद के दाता हैं। कोटि ब्रह्मांडों के सृष्टि करता कार्य ब्रह्म, सतपुरुष, अक्षर ब्रह्म इनके सत अंग हैं। यह आनंदस्वरुप श्यामा के स्वामी हैं। श्री कृष्ण सर्व चेतना के केंद्र बिंदु हैं और सभी आत्मायों के हृदये में रहते हैं। यह प्रेम के स्वरुप हैं। ऐसे श्री कृष्ण को आत्म

सही नाम दियो मोहोर अपनी

मोहे अपनों सब दियो, रही न कोई सक। सही नाम दियो मोहोर अपनी, कर रोसन थापी हक ।। १८ प्रकरण ६१ श्री किरन्तन महामति प्राणनाथ वाणी चिंतन और मंथन हे धनी ! आपने अपनी सारी विशेषताएँ मुझे प्रदान कीं, इसमें कोई सन्देह नहीं रहा. इतना ही नहीं, आपने तो अपने नामकी सही और सिक्का प्रदान कर परमात्माके रूपमें प्रकाशित किया.

श्री प्रकाश ग्रन्थ किसके लिए है?

सनमंधी साथकों कहे बचन, जीवको एता कौन कहे जी।
ए बानी सुन ढील करे क्यों वासना, सो ए विषम भोम क्यों रहे जी ।।२८

अपने सम्बन्धी सुन्दरसाथको ही इतने वचन कहे जा रहे हैं, अन्यथा साधारण जीवको इतना कौन कहता है ? इन वचनोंको सुनकर ब्रह्म आत्माएँ ढील क्यों करेंगीं ? इस विषमय भूमिकामें वे कैसे रह सकतीं हैं ?

एह विध कर कर आतम जगाई, तब होसी सब सुध जी ।
सुध हुए पूर चलसी प्रेमके, होसी जाग्रत हिरदें बुध जी ।।४५

यदि इस प्रकार अपनी आत्माको जगा लोगे तब तुम्हें घरकी तथा धामधनीकी सब सुधि हो जाएगी. इस प्रकार सुधि होने पर प्रेमका प्रवाह बहने लगेगा और हृदयमें जागृत बुद्धिका प्रकाश फैल जाएगा.

निरमल हिरदेंमें लीजो बचन, ज्यों निकसे फूट बान जी ।
ए कह्या ब्रह्मसृष्ट ईस्वरी को, ए क्यों लेवे जीव अग्यान जी ।।४६

सद्गुरुके इन वचनोंको अपने निर्मल हृदयमें धारण करो, जिससे यह वाणी अङ्कुरित हो सके. ब्रह्मसृष्टि और ईश्वरीय सृष्टिके लिए ही यह सब कहा गया है. अज्ञाानी जीव इसे कैसे धारण (ग्रहण) कर सकते हैं ?

माया जीव हममें रेहे ना सके, सो ले ना सके एह बचन जी ।
ना तो सबद घने लागसी मीठे, पर रेहेनंे ना देवे झूठा मन जी ।।४7

मायासे उत्पन्न जीव हमारे साथ नहीं रह पाएँगे. वे इन वचनोंको ग्रहण नहीं कर सकते. अन्यथा इस वाणीके शब्द उन्हें भी अत्यधिक मधुर लगते, परन्तु यह झूठा मन उन्हें अन्तरमें टिकने नहीं देगा.

जो कोई जीव होए मायाको, सो चलियो राह लोक सत जी ।
जो कोई होवे निराकार पार को, सो राह हमारी चलत जी ।।४८

जो मायासे उत्पन्न जीव हैं वे इसी ब्रह्माण्डमें सत लोक (वैकुण्ठ) की राह पर चलें. जो कोई निराकारके पार परमधामके होंगे, वे ही हमारी राह पर चल सकते हैं.
बासनाको तो जीव न कहिए, जीव कहिए तो दुख लागे जी ।
झूठेकी संगते झूठा केहेत हों, पर क्या करों जानों क्योंए जागे जी ।।४९

ब्रह्मवासनाको तो जीव नहीं कहना चाहिए. उन्हें जीव कहते हुए मुझे दुःख होता है. इस झूठी मायाके सङ्गतके कारण उन्हें भी झूठा (जीव) कहना पड. रहा है. परन्तु क्या करें ? किसी भी प्रकार वे जाग जाएँ, यही हमारा प्रयत्न है.

ए कठन बचन मैं तो केहेती हों, ना तो क्यों कहूं बासनाको जीव जी ।
जिन दुख देखे गुन्हेंगार होत है, आग्या ना मानो पीउ जी ।।५०

इसलिए मुझे ये कठिन वचन कहने पड. रहे हैं अन्यथा मैं ब्रह्मवासनाको जीव क्यों कहूँ ? दुःखोंको देखकर (उनमें रच-पच कर) वे गुन्हेगार बन रहे हैं और धनीकी आज्ञाा भी मान नहीं रहे हैं.

प्रकास बानी तुम नीके कर लीजो, जिन छोडो एक छिन जी ।
अंदर अरथ लीजो आतम के, बिचारियो अंतसकरन जी ।।५१

प्रकाश ग्रन्थकी वाणीको तुम भली भाँति ग्रहण करो, इसे एक क्षणके लिए भी मत छोड.ो. इसके द्वारा आत्माके गूढ. अर्थको ग्रहण करो और उसे अन्तर्मनमें भली प्रकार विचार करो.

अंदर का जब लिया अरथ, तब नेहेचे होसी प्रकास जी ।
जब इन अरथे जागी बासना, तब वृथा न जाए एक स्वांस जी ।।५२

जब तुम इस वाणीके द्वारा आन्तरिक अर्थ ग्रहण करोगे, तब निश्चय ही अन्तरात्मामें ज्ञाानका प्रकाश फैल जाएगा. जब इन अर्थोंके द्वारा आत्मा जागृत हो जाएगी, तब एक श्वास भी व्यर्थ नहीं जाएगा.

ए प्रगट बानी कही प्रकासकी, इन्द्रावती चरने लागे जी ।
सो लाभ लेवे दोनों ठौरको, जाकी बासना इत जागे जी ।।५३

इन्द्रावती सद्गुरु धनीके चरणोंमें लगकर प्रकाश ग्रन्थकी यह प्रकट वाणी प्रकाशित कर रही है. जिसकी आत्मा इसी संसारमें जागृत हो जाएगी, वही संसार और परमधाम दोनोें स्थानोंका लाभ प्राप्त करेगी.
प्रकरण ३०
श्री प्रकाश (हिन्दुस्तानी) महामति प्राणनाथ वाणी चिंतन और मंथन

दिए निध प्राणनाथ

व्रजतणी लीला कही, वली विसेखे रास।
श्री धामतणां सुख वरणवे, दिए निध प्राणनाथ।।
४९ प्रकरण १ श्री रास महामति प्राणनाथ वाणी चिंतन और मंथन

प्राणनाथ सद्गुरुने सर्व प्रथम व्रजकी लीलाका, फिर विशेष रूपसे रास और परमधामके अनन्त सुखोंका वर्णन कर हमें अखण्ड निधि प्रदान की है.

I have told you the leela(sport) of Braj and that of Raas. Prannath have described the infinite joy of Abode and has given you the path to reach Him (The technique to awaken is given in Braj and Raas, this is revealed by our beloved Lord the Supreme Godhead Shri Krishna along with the bliss of abode so the celestial souls get the cue and awaken herself in Paramdham

Pages

Subscribe to Paramdham RSS